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मन रूपी घोड़ों को नियंत्रित कर ही जीवन रथ को श्रेष्ठ बनाया जा सकता है : बीके स्वाति दीद

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बिलासपुर। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की बिलासपुर मुख्य शाखा, टेलीफोन एक्सचेंज रोड स्थित राजयोग भवन की संचालिका बीके स्वाति दीदी ने रथ यात्रा के पावन अवसर पर इसके गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों पर प्रकाश डाला। राजयोग भवन में आयोजित विशेष आध्यात्मिक सत्र को संबोधित करते हुए बीके स्वाति दीदी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में मनाए जाने वाले हर पर्व और उत्सव के पीछे गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है। वर्तमान समय में हम इन त्योहारों के केवल बाह्य स्वरूप को देख रहे हैं, जबकि इनके वास्तविक भाव और मर्म को जीवन में उतारना अत्यंत आवश्यक है।

बीके स्वाति दीदी ने कहा कि ‘कठोपनिषद’ और ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में मानव शरीर की तुलना एक रथ से की गई है। इस रथ अर्थात शरीर का वास्तविक रथी अविनाशी आत्मा है। वर्तमान समय में अज्ञानता और विकारों के कारण आत्मा भ्रमित हो गई और उसकी लगाम बेकाबू हो चुकी है और इंद्रियां रूपी घोड़े जीवन रथ को पतन की ओर ले जा रहे हैं।
स्वाति दीदी ने आगे समझाया कि जब तक हम अपने इस जीवन रथ का सारथी स्वयं परमपिता परमात्मा शिव को नहीं बनाएंगे, तब तक जीवन में भटकाव बना रहेगा। जब मनुष्य राजयोग के अभ्यास द्वारा अपनी बुद्धि का कनेक्शन परमात्मा से जोड़ता है, तो उसकी बुद्धि दिव्य बनती है। दिव्य बुद्धि रूपी सारथी फिर मन और इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण पाकर जीवन रथ को सुख, शांति और समृद्धि के मार्ग पर ले जाता है। दीदी ने रथ यात्रा के मुख्य आराध्य देवों का आध्यात्मिक विश्लेषण करते हुए कहा कि जगन्नाथ का अर्थ है ‘जगत के नाथ’ यानी पूरे ब्रह्मांड के पिता। वे किसी एक धर्म या संप्रदाय के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याणकारी शिव परमात्मा हैं।

बलभद्र (बलराम)- यह आत्मिक बल और पवित्रता के प्रतीक हैं। बिना आत्मिक बल के जीवन की नकारात्मकताओं से नहीं लड़ा जा सकता।
सुभद्रा- यह शुभ दृष्टि, शुभ भावना और कल्याणकारी वृत्ति की प्रतीक हैं। जब जीवन में पवित्रता का बल और सबके प्रति शुभ भावना का समावेश होता है, तभी हमारा जीवन जगन्नाथ (परमात्मा) के रथ पर सवार होने के योग्य बनता है।

उन्होंने आगे कहा कि भगवान जगन्नाथ का अपनी मौसी के घर जाना वास्तव में आत्मा का अपने मूल घर ‘परमधाम’ को याद करने का प्रतीक है। यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि हम इस धरा पर कुछ समय के लिए आए मुसाफिर हैं और हमारा असली घर शांतिधाम है।
रथ यात्रा से पूर्व होने वाले ‘नेत्र उत्सव’ के रहस्य को खोलते हुए बीके स्वाति दीदी ने कहा कि भगवान के विग्रहों को पंद्रह दिनों के एकांतवास (अनासर काल) के बाद नए वस्त्र और नई दृष्टि दी जाती है। यह इस बात का सूचक है कि मनुष्य को भी समय-समय पर अंतर्मुखता के एकांत में बैठकर आत्म-निरीक्षण करना चाहिए। जब हम राजयोग के माध्यम से काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी पुरानी आसुरी वृत्तियों का त्याग करते हैं, तो हमें ‘ज्ञान चक्षु’ अर्थात तीसरा नेत्र प्राप्त होता है। इसी दिव्य दृष्टि से जीवन में ‘नवयौवन’ अर्थात आध्यात्मिक चेतना का नया संचार होता है।
*रथ खींचने और छरपहरा (झाड़ू लगाने) की रस्म*
स्वाति दीदी ने रथ यात्रा की प्रसिद्ध परंपराओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पुरी में राजा स्वयं भगवान के रथ के आगे सोने की झाड़ू से बुहारी लगाते हैं, जिसे ‘छरपहरा’ कहा जाता है। यह रस्म सिखाती है कि भगवान की नजर में कोई बड़ा या छोटा नहीं है। परमात्मा के मार्ग पर अहंकार का कोई स्थान नहीं है। चाहे कोई राजा हो या रंक, भगवान का सामीप्य पाने के लिए नम्रता और मन बुद्धि की स्वच्छता अनिवार्य है। वहीं, लाखों श्रद्धालुओं द्वारा रथ की रस्सियों को खींचने का रहस्य यह है कि जब समाज का हर वर्ग मिलकर श्रेष्ठ कर्मों की रस्सी खींचता है, तभी सुखमय संसार की स्थापना होती है। एक-एक उंगली देने से या मिलकर सहयोग करने से बड़े से बड़ा कार्य भी सुगम हो जाता है।

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भूपेन्द्र पाण्डेय

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