शिवरीनारायण। काशी में अंतिम संस्कार को लेकर सनातन परंपरा में गहरी आस्था है। इसी आस्था के चलते शिवरीनारायण के शिव कुमार शर्मा अपनी मां की अंतिम यात्रा करीब 600 किलोमीटर दूर काशी तक लेकर गए। 3 अगस्त 2026 को उन्होंने मणिकर्णिका घाट पर मां का अंतिम संस्कार कराया।
शिव शर्मा के लिए यह पहली ऐसी यात्रा थी। इतनी लंबी दूरी के कारण मन में स्वाभाविक चिंता थी, लेकिन काशी पहुंचने के बाद वहां की व्यवस्था देखकर उन्हें संतोष हुआ। उनका कहना है कि दूरी जरूर ज्यादा है, लेकिन आज की सुविधाओं के कारण काशी में अंतिम संस्कार कराना उतना कठिन नहीं, जितना आमतौर पर लोग समझते हैं।
एंबुलेंस में फ्रीजर की सुविधा, करीब 15 घंटे में पहुंचे काशी
शिवरीनारायण से काशी की दूरी करीब 600 किलोमीटर है। लंबी दूरी के कारण कई परिवार अंतिम संस्कार के लिए काशी जाने से हिचकते हैं। शिव शर्मा बताते हैं कि एंबुलेंस में फ्रीजर की सुविधा होने से मां को काशी ले जाना संभव हो सका। करीब 15 घंटे की यात्रा के बाद वे काशी पहुंचे। रास्ते में किसी तरह की परेशानी नहीं हुई।
गाड़ी से उतरते ही पंडित, लकड़ी और जरूरी सामग्री उपलब्ध
शिव शर्मा के अनुसार काशी पहुंचने के बाद अंतिम संस्कार की तैयारियों के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ा। गाड़ी से उतरते ही क्रियाकर्म कराने वाले पंडित, चिता की लकड़ी और अन्य जरूरी सामग्री उपलब्ध हो गई। अंतिम संस्कार से जुड़ी व्यवस्थाएं आसानी से मिल गईं।
उनके अनुसार एंबुलेंस सहित पूरी यात्रा में करीब 60 हजार रुपए खर्च हुए। काशी की व्यवस्था देखकर उन्हें संतोष हुआ। उनका कहना है कि दूर से आने वाले परिवारों के लिए भी अंतिम संस्कार की प्रक्रिया सहज तरीके से पूरी हो जाती है।
मणिकर्णिका घाट पर महसूस हुई अलग तरह की शांति
मां के अंतिम संस्कार को याद करते हुए शिव शर्मा कहते हैं कि मणिकर्णिका घाट पर पहुंचकर मन को एक अलग तरह की शांति मिली। मां को भगवान भोलेनाथ की नगरी में अंतिम विदाई देना उनके लिए भावुक क्षण था।
काशी को सनातन परंपरा में मोक्ष की नगरी माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव काशी में जीव को तारक मंत्र देकर मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। इसी विश्वास के कारण देशभर से लोग अपने दिवंगत परिजनों की अंतिम यात्रा काशी तक लेकर आते हैं।
संभव हो तो अपने परिजन की अंतिम यात्रा काशी तक ले जाएं
शिव कुमार शर्मा कहते हैं कि काशी की दूरी भले ही अधिक हो, लेकिन आज एंबुलेंस और परिवहन की सुविधाओं से यह यात्रा आसान हो गई है। उनके अनुभव में काशी पहुंचने के बाद अंतिम संस्कार के लिए जरूरी व्यवस्थाएं भी सहज रूप से उपलब्ध हैं।
वे कहते हैं, “यदि परिवार की परिस्थितियां और साधन अनुमति दें, तो अपने दिवंगत परिजन की अंतिम यात्रा काशी तक ले जाने का प्रयास करना चाहिए। मां को महादेव की नगरी में अंतिम विदाई देना मेरे लिए जीवन का ऐसा अनुभव है, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता।”