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बालिका सशक्तिकरण हेतु बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण की आवश्यकता – मुख्य न्यायाधीश “नन्हीं बालिका भारत की आत्मा है” – न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा

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छत्तीसगढ़/बिलासपुर :— छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की विशेष सेल फॉर POCSO समिति एवं किशोर न्याय समिति द्वारा, छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी एवं छत्तीसगढ़ राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, बिलासपुर के सहयोग से“बालिका संरक्षण : भारत में उसके लिए एक सुरक्षित एवं सक्षम वातावरण की ओर” विषय पर एक राज्य स्तरीय परामर्शका आयोजन किया गया, जिसमें न्यायपालिका, शासकीय विभागों, विधि प्रवर्तन एजेंसियों, गैर-सरकारी संगठनों तथा नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधियों नेभाग लिया। इस कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि माननीय श्री न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा, मुख्य न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता माननीय मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गई, साथ ही माननीय श्री न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल, माननीय श्रीमती न्यायमूर्ति रजनी दुबे तथा माननीय श्री न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। कार्यक्रम मेंमाननीय श्री न्यायमूर्ति पार्थप्रतीम साहू, माननीय श्री न्यायमूर्ति

सचिन सिंह राजपूत, माननीय श्री न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल, माननीय श्री न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की गरिमामय उपस्थिति रही। अपने उद्बोधन मेंमाननीय मुख्य न्यायमूर्ति महोदय ने इस बात पर बल दिया कि बालिका की सुरक्षा, सम्मान और सशक्तिकरण सुनिश्चित करना केवल विधिक जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि नैतिक और संवैधानिक दायित्व भी है। बालिका के लिए सुरक्षित वातावरण केवल उसे अपराध से बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह

सकारात्मक पहल से आरंभ होता है — गुणवत्तापूर्णशिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समान अवसर की उपलब्धता अपरिहार्यहै । सभी संस्थानों का उद्देश्य केवल अन्याय को रोकना नहीं, बल्कि सशक्तिकरण है। अपने प्रभावशाली संबोधन मेंमाननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय नेकहा कि बालिका संरक्षण के लिए बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण आवश्यक है — स्वास्थ्य विशेषज्ञ उपचार हेतु, पुलिस सुरक्षा हेतु, समुदाय पोषण हेतु, विधिक संस्थान अधिकारों की रक्षा हेतु और सबसेबढ़कर, समाज को अपनी सोच बदलनेहेतुकर्तव्यबद्ध है। यदि हम सामूहिक रूप से इस दृष्टिकोण को अपनाएँ, तो हम न केवल सुरक्षित बल्कि वास्तव में सक्षम वातावरण बना सकेंगे, जहाँभारत की हर बालिका स्वतंत्रतापूर्वक सपनेदेख सके, निडर होकर आगेबढ़ सके और अपनी पूर्ण क्षमता प्राप्त कर सके। माननीय मुख्य न्यायाधीश ने अपनेवक्तव्य मेंयह भी कहा कि शासन की प्रत्येक संस्था को बच्चों के अधिकारों का संरक्षक बनकर कार्यकरना चाहिए। हमारा यह पावन दायित्व हैकि प्रत्येक पीड़िता को न्याय मिले । “नन्हीं बालिका भारत की आत्मा है। हमें उसका हाथ थामकर उसे गरिमा के साथ भविष्य की ओर लेजाना है।” यह दृष्टि

हमेंदान या कृपा से नहीं, बल्कि न्याय और कर्तव्य की भावना सेप्रेरित करती है। तकनीकी सत्रों में विचार-विमर्शकेमुख्य विषय :• राज्य, राष्ट्रीय एवं वैश्विक परिप्रेक्ष्य मेंबालिकाओं के विरुद्ध हिंसा तथा “बेटी

बचाओ बेटी पढ़ाओ” जैसी प्रमुख योजनाओं की समीक्षा।

• शिक्षकों एवं अधिकारियों की सुरक्षित विद्यालयी वातावरण सृजित करने तथा

जागरूकता के माध्यम सेबालिकाओं को सशक्त बनानेमेंभूमिका।

• गैर-सरकारी संगठनों का जनजागरूकता बढ़ाने और नीतिगत सुधार के लिए

वकालत करनेमेंयोगदान ।

• परिवार और समुदाय के सहयोग, लैंगिक संवेदनशीलता तथा सुरक्षित घरेलू

वातावरण का महत्व।

• बाल संरक्षण सेवाओं एवं तंत्रों के कार्यान्वयन मेंअंतराल और चुनौतियों की

पहचान।

• बालिकाओं पर हिंसा के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को समझना तथा शीघ्र हस्तक्षेप और

स्वास्थ्य-जागरूकता की आवश्यकता।

• विधि प्रवर्तन तंत्र, जाँच प्रक्रियाएँ तथा यूनिसेफ जैसी संस्थान के सहयोग सेबाल-

हितैषी वातावरण का निर्माण।

• विधिक संरक्षण ढाँचेकी समीक्षा, जिसमेंकिशोर न्याय बोर्ड और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की भूमिका शामिल है।

इस अवसर पर उच्च न्यायालय POCSO समिति एवं किशोर न्याय समिति ने, छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी एवं छत्तीसगढ़ राज्य विधिक सेवा

प्राधिकरण, बिलासपुर के सहयोग से“यौन अपराधों सेबालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO अधिनियम) के अंतर्गत विभिन्न हितधारकों की भूमिका” शीर्षक से एक लीफलेट ( पंपलेट) का विमोचन किया, जिसका उद्देश्य जनजागरूकता बढ़ाना है। इस लीफलेट ( पंपलेट) का औपचारिक विमोचन मुख्य अतिथि माननीय श्री न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा, मुख्य न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, माननीय श्री न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल, माननीय श्रीमती न्यायमूर्ति रजनी दुबे एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी द्वारा किया गया। उद्घाटन सत्र मेंप्रारंभिक संबोधन माननीय श्रीमती न्यायमूर्ति रजनी दुबेद्वारा दिया गया। की नोट संबोधन माननीय श्री न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल ने प्रस्तुत किया तथा आभार प्रदर्शन माननीय श्री न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु द्वारा किया गया। कार्यक्रम मेंदो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनकी अध्यक्षता सत्र की अध्यक्षता माननीय श्रीमती न्यायमूर्ति रजनी दुबे, न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ उच्च

न्यायालय द्वारा की गई तथा सह-अध्यक्षता माननीय श्री न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु, न्यायाधीशगण, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा की गई। इस कार्यक्रम मेंविधि विभाग के प्रमुख सचिव, प्रभारी रजिस्ट्रार जनरल, रजिस्ट्री के अधिकारीगण, न्यायिक अकादमी के निदेशक एवं अधिकारीगण, छत्तीसगढ़ राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव एवं अधिकारीगण, उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति के सचिव, फास्ट ट्रैक/फास्ट ट्रैक स्पेशल न्यायालयो के पीठासीन अधिकारी, किशोर न्याय बोर्डके प्रधान मजिस्ट्रेट , जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के सचिव, प्रशिक्षुसिविल न्यायाधीशगण , महिला एवं बाल विकास विभाग, शिक्षा विभाग, पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास विभाग तथा समाज कल्याण विभाग के सचिव एवं प्रतिनिधि, स्वास्थ्य विभाग के प्रतिनिधि, बिलासपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक एवं पुलिस विभाग के प्रतिनिधि, कलेक्टर एवं पुलिस अधीक्षक बिलासपुर, राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष एवं प्रतिनिधि तथा यूनिसेफ के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

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भूपेन्द्र पाण्डेय

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