बिलासपुर। शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रखने के बजाय संस्कृति, लोकपरंपराओं और स्थानीय ज्ञान से जोडऩा विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी है। कहानी कहने की कला और विभिन्न रचनात्मक विधाएं न केवल ज्ञान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाती हैं, बल्कि समाज के मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को भी संरक्षित करती हैं। यह विचार डॉ. सीवी रमन विश्वविद्यालय में आयोजित व्याख्यान एवं संवाद कार्यक्रम में इंटरनेशनल सेंटर फॉर कल्चरल स्टडीज (आईसीसीएस) की मालविका जोशी ने व्यक्त किए। कार्यक्रम में उन्होंने विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्राध्यापकों से संवाद करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में लोककथाओं, गीतों, चित्रकला, नृत्य और आख्यानों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इन माध्यमों से समाज ने अपने अनुभव, जीवन-दृष्टि और मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया है। शिक्षा में इन विधाओं को शामिल करने से विद्यार्थियों की कल्पनाशीलता, संवेदनशीलता और रचनात्मक क्षमता का विकास होता है। उन्होंने प्राध्यापकों और शोधार्थियों से भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा पर शोधपत्र तैयार करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि आईसीसीएस के माध्यम से इन शोधपत्रों को प्रकाशित कर भारतीय ज्ञान और संस्कृति को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया जा सकता है। मालविका जोशी ने विश्वविद्यालय में शिक्षा के साथ लोककला, ग्रामीण विकास और नवाचार को जोडऩे के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने छत्तीसगढ़ी संजोही, छत्तीसगढ़ी लोककला एवं संस्कृति केंद्र, भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र, सामुदायिक रेडियो रमन, ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभाग और इनक्यूबेशन सेंटर का अवलोकन किया। इस दौरान स्थानीय ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को अकादमिक गतिविधियों से जोडऩे की संभावनाओं पर चर्चा हुई। विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. अरविंद कुमार तिवारी ने कहा कि स्थानीय संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा का हिस्सा बनाना समय की आवश्यकता है। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों में सामाजिक समझ और सृजनशीलता विकसित करने में सहायक हैं। कार्यक्रम में जनसंपर्क अधिकारी किशोर सिंह सहित विभिन्न विभागों के प्राध्यापक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
भारतीय परंपरा में लोककथाओं, गीतों, चित्रकला, नृत्य और आख्यानों का महत्वपूर्ण स्थान
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