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बाईपास ट्रैक पर सामने मालगाड़ी देख यात्रियों की थमी सांसें, बाद में मिली राहत

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कोरबा। चांपा-उरगा रेल खंड के बीच शनिवार को एक ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसने एक बारगी तो छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस में सफर कर रहे सैकड़ों यात्रियों की धड़कनें बढ़ा दीं। दरअसल, सिवनी से आगे चांपा की ओर बढ़ रही ट्रेन के यात्रियों ने जब उसी ट्रैक पर कुछ ही दूरी पर आगे एक कोयला लदी मालगाड़ी को चलते और फिर खड़े देखा, तो वे किसी अनहोनी की आशंका से सहम गए। हालांकि, रेलवे प्रशासन ने साफ किया है कि यह कोई लापरवाही या चूक नहीं, बल्कि रेलवे की अत्याधुनिक ‘ऑटोमेटिक सिग्नलिंग प्रणाली’ का हिस्सा था, जो पूरी तरह सुरक्षित है।

यह स्थिति कोरबा से सुबह 11:41 बजे अमृतसर के लिए रवाना हुई गाड़ी संख्या 18237 छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस के यात्रियों के साथ निर्मित हुई। गाड़ी बालपुर तक सामान्य रफ्तार से चलती रही। इसके बाद जैसे ही ट्रेन सिवनी से आगे चांपा की ओर बढ़ी, तो सिवनी-चांपा के बीच बाईपास ट्रैक के मोड़ पर यात्रियों की नजर उसी ट्रैक पर आगे खड़ी मालगाड़ी पर पड़ी।

​ट्रेन के आउटर पर करीब 15 मिनट से अधिक समय तक खड़े रहने के कारण जब कुछ यात्रियों ने नीचे उतरकर देखा, तो मालगाड़ी महज कुछ मीटर की दूरी पर खड़ी दिखाई दी। इससे यात्रियों के बीच डर और भ्रम की स्थिति बन गई। कुछ लोगों ने इसे नई तकनीक का असर बताया तो कुछ इसे अनुचित प्रयोग भी कहने लगे। बाद में जब दोनों गाड़ियां सुरक्षित रवाना हुईं, तब जाकर यात्रियों ने राहत की सांस ली।

बिलासपुर के वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक अनुराग कुमार सिंह ने बताया कि: “रेलवे द्वारा चांपा से उरगा (28 किमी) खंड के बीच ऑटोमेटिक सिग्नलिंग प्रणाली का कार्य पहले ही पूरा कर इसे चालू किया जा चुका है। इसके कारण एक ही ट्रैक पर एक के पीछे एक कई ट्रेनों को सुरक्षित दूरी के साथ चलाया जा सकता है। इस प्रणाली से ट्रेनों की परिचालन समयबद्धता मजबूत हुई है और ठहराव की समय सीमा भी घटी है।”

​समझिए तकनीक: 150 मीटर की दूरी पर रुकना अनिवार्य, लाल सिग्नल पर ये हैं नियम
​ऑटोमेटिक सिग्नलिंग का एक खास नियम है जो हादसों को पूरी तरह रोकता है:
​लाल सिग्नल का नियम: यदि ट्रैक पर आगे कोई ट्रेन खड़ी है, तो उसके ठीक पीछे वाले ब्लॉक का सिग्नल ऑटोमेटिकली लाल हो जाता है।
​रुकावट और सावधानी: पीछे से आने वाली ट्रेन के लोको पायलट को लाल सिग्नल दिखने पर ट्रेन को रोकना होता है। यदि लाल सिग्नल काफी देर तक नहीं बदलता, तो लोको पायलट को दिन में 1 मिनट और रात में 2 मिनट रुकने के बाद बेहद सतर्कता से आगे बढ़ने की अनुमति होती है।
​रफ्तार पर नियंत्रण: इस दौरान ट्रेन को अधिकतम 15 किमी/घंटा (कम दृश्यता या कोहरे में 10 किमी/घंटा) की रफ्तार से ही आगे बढ़ाना होता है। लोको पायलट को गति इतनी नियंत्रित रखनी होती है कि आगे खड़ी ट्रेन दिखने पर वह उससे कम से कम 150 मीटर से 300 मीटर पहले अपनी ट्रेन को आसानी से रोक सके।
​दूरी का निर्धारण: ऑटोमेटिक सिग्नल आमतौर पर हर 1 से 1.5 किलोमीटर की दूरी पर लगे होते हैं। इसलिए, यदि आगे वाली ट्रेन स्टेशन या ट्रैक पर खड़ी है, तो पीछे वाली ट्रेन उससे सुरक्षित दूरी पर पिछले सिग्नल पर रुक जाती है, जिससे टकराव का कोई खतरा नहीं रहता।

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भूपेन्द्र पाण्डेय

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